108. मेरे हाथों में कोई साज़ दे दो
मेरे हाथों में कोई साज़ दे दो
मैं नग़मा हूँ मुझे आवाज़ दे दो
पुरानी चाल धीमी पड़ चुकी है
ज़माने को नया अंदाज़ दे दो
सितारों को परिन्दे ला रहे हैं
मुझे भी क़ुव्वते-परवाज़ दे दो
भले लगते नहीं मासूम चेहरे
हसीनों को निगाहे-नाज़ दे दो
समन्दर चाहता है कुछ ये "माँझी"
इसे नज़राना-ए-जाँबाज़ दे दो
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. क़ुव्वते-परवाज़=उड़ने की शक्ति, 2. नज़राना-ए-जाँबाज़=न्योछावर होने की लालसा रखनेवाले की भेंट।
(समन्दर के दायरे से )
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