135. जाने कब दूर तीरगी होगी
जाने कब दूर तीरगी होगी
चाँद निकलेगा रौशनी होगी
लोग आपस में सर को फोड़ेंगे
बज़्म में जब तेरी कमी होगी
सोचले छोड़कर न जा मुझको
और भी तल्ख़ ज़िन्दगी होगी
मैं तो खोया रहा ख़यालों में
उसने आवाज़ मुझको दी होगी
होगा कोई तो मुन्तज़िर "माँझी"
नाव साहिल पे जब रुकी होगी
-देवेन्द्र मांझी
शब्दार्थ--1. तीरगी=अँधेरा, 2. बज़्म=महफ़िल, 3. तल्ख़=कड़वी, 4. मुन्तज़िर=प्रतीक्षारत।
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