116. पीछा इन सोचों के लश्कर से छुड़ाता कैसे
पीछा इन सोचों के लश्कर से छुड़ाता कैसे
शहर तन्हाई में ख़्वाबों का बसाता कैसे
लाख चाहा था झुलसने से रहूँ दूर मगर
धूप देहलीज़ पे थी उसको उठाता कैसे
सबने पहचान लिया आज मेरे क़ातिल को
खूं-रंगे हाथ थे वो शख़्स छुपाता कैसे
आज जंगल में कहीं आग भड़क उट्ठी है
गर्म पत्तों को यह झोंका यहाँ लाता कैसे
इतना कोहरा था की साहिल भी दिखाई न दिया
"माँझी" इस नाव को दरिया में घुमाता कैसे
-देवेन्द्र माँझी
(समन्दर के दायरे से)
Well written 😄
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