120. हैं मुख़ालिफ़ वो बेवफ़ा की तरह
हैं मुख़ालिफ़ वो बेवफ़ा की तरह
जिनको पूजा था देवता की तरह
कैसे आँगन की धूप तक पहुँचूँ
सर पे छाए हैं वो घटा की तरह
उनकी यादों का शहर उजड़ता है
वो गुज़रते हैं जब हवा की तरह
राख बनने के इन्तिज़ार में दोस्त
जल रहा है कोई चिता की तरह
जोग कबसे लिया है बतला दे
बाल शानों पे हैं जटा की तरह
रह गए पीछे नाव के "माँझी"
कुछ निशानात नक़्शे-पा की तरह
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. मुख़ालिफ़=विरोधी, 2. शानों पे=कन्धों पर, 3. निशानात=निशानों का बहुवचन, 4. नक़्शे-पा=पाँव के निशान।
("समन्दर के दायरे" से)
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