109. जो हक़ीक़त है तुमसे कहता हूँ
जो हक़ीक़त है तुमसे कहता हूँ
आज मैं खण्डरों-सा ढहता हूँ
घेर लेते हैं अक्स यादों के
जब भी तनहा-उदास रहता हूँ
वो तो सब हो गए हैं गंगाजल
मैं समन्दर के साथ बहता हूँ
जब से आया हूँ इस क़बीले में
ग़म बिछुड़ने का रोज़ सहता हूँ
फ़िक्र दुनिया की क्या करूँ "माँझी"
अपनी मस्ती में मस्त रहता हूँ
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. हक़ीक़त=सच्चाई, 2. अक्स=प्रतिबिम्ब।
(समन्दर के दायरे से )
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