94. तुझ बिन प्यारे चैन कहाँ है
तुझ बिन प्यारे चैन कहाँ है
जिस्म यहाँ है, जान वहाँ है
लोगो, हम सब क़ातिल ठहरे
कौन बताए किस पे गुमाँ है
पागल हो तुम पूछनेवालो
दीवानों का कोई मकाँ है
तुम ही चीखो, तुम ही गाओ
अपनी तो ख़ामोश ज़ुबाँ है
मेरी बस्ती मुझको न जाने
तुझसे वाक़िफ़ सारा जहाँ है
कल तक जिसने शौहरत पाई
आज वही बेनामो-निशाँ है
"माँझी" अपनी नाव सम्हालो
चारों तरफ़ से दरिया रवाँ है
-देवेन्द्र माँझी
नोट- यह ग़ज़ल मेरे प्रथम संग्रह "समन्दर के दायरे" से है, जिसका प्रकाशन 1985 में हुआ था।
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