दुुनिया रश्क करेगी मुझपर मैंने माॅंझी को देखा है...
मैंने गालिब को नहीं देखा। मीर से नहीं मिला। दुष्यंत कुमार को भी सामने से नहीं देख पाया। लेकिन फख्र है कि मैंने मांझी को देखा है। मांझी के साथ जीया है। मांझी से सीखा है। आज जबकि गजल की लोकप्रियता ऊंची मीनारों को छूने लगी है, तो गजल के कथित पैरोकार भाषायी कैंची लेकर उसके पंख काटने की होड़ में दिखाई देते हैं। जब बात केवल गजल की होनी चाहिए ऐसे में गजल के मशहूर करने की बजाय उसे हिंदी, उर्दू, गुजराती और पंजाबी भाषा के बीच गजल को बांधने को व्याकुल दिख रहे हैं। ऐसे में देवेन्द्र मांझी अपनी अलग लय और ताल के साथ गजल को केवल गजल मान उसकी चाकरी करने में लगे हैं।
सभी जानते हैं कि ग़ज़ल के आख़िरी शे`र में मक़्ता के प्रयोग की एक समृद्ध
परम्परा रही है। मिर्ज़ा ग़ालिब, फ़िराक़ गोरखपुरी, फ़ैज़ अहमद "फ़ैज़" सभी ने
अपने-अपने अंदाज़ में मक़्ते का प्रयोग किया है। हिन्दी के ग़ज़लकारों में
त्रिलोचन, बलबीर सिंह "रंग" और गोपालदास नीरज ने भी इस परम्परा का निर्वाह
किया है।
देवेन्द्र माँझी ने अपने "माँझी" उपनाम को अपने मक़्तों में जिस ख़ूबी और कौशल से पिरोया है, वह निश्चय ही विस्मयकारी है। उन्होंने माँझी शब्द को नदी, तूफ़ान, नाव, भँवर, दरिया, समन्दर, लहर, तट, रवानी, मौजों, थपेड़ों, साहिल और पतवार जैसे अनेक शब्दों को रूपकों में ढालकर बला की ख़ूबसूरती पैदा की है। कुछ उदाहरण देखिये--
"माँझी" को काटने दो समन्दर के दायरे
अब आ गयी है हाथ में पतवार चुप रहो
इतना कोहरा था कि साहिल भी दिखाई न दिया
"माँझी" इस नाव को दरिया में घुमाता कैसे
मेरे सिवा इस घाट पे कोई भी तो "माँझी"
तूफ़ान से टकराने को तैयार नहीं था
सारी दुनिया ही किनारे पे खड़ी है "माँझी"
अपनी इस छोटी-सी कश्ती में बिठाऊँ किसको
बीच तूफाँ के कोई चीख रहा है "माँझी"
मेरी कश्ती को किनारे से लगा दे कोई
चल कहीं "माँझी" उठा पतवार अपने हाथ में
अब सहा जाता नहीं मौजों का साहिल पे सितम
देवेन्द्र माँझी ने अपने "माँझी" उपनाम को अपने मक़्तों में जिस ख़ूबी और कौशल से पिरोया है, वह निश्चय ही विस्मयकारी है। उन्होंने माँझी शब्द को नदी, तूफ़ान, नाव, भँवर, दरिया, समन्दर, लहर, तट, रवानी, मौजों, थपेड़ों, साहिल और पतवार जैसे अनेक शब्दों को रूपकों में ढालकर बला की ख़ूबसूरती पैदा की है। कुछ उदाहरण देखिये--
"माँझी" को काटने दो समन्दर के दायरे
अब आ गयी है हाथ में पतवार चुप रहो
इतना कोहरा था कि साहिल भी दिखाई न दिया
"माँझी" इस नाव को दरिया में घुमाता कैसे
मेरे सिवा इस घाट पे कोई भी तो "माँझी"
तूफ़ान से टकराने को तैयार नहीं था
सारी दुनिया ही किनारे पे खड़ी है "माँझी"
अपनी इस छोटी-सी कश्ती में बिठाऊँ किसको
बीच तूफाँ के कोई चीख रहा है "माँझी"
मेरी कश्ती को किनारे से लगा दे कोई
चल कहीं "माँझी" उठा पतवार अपने हाथ में
अब सहा जाता नहीं मौजों का साहिल पे सितम
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