104. यादे-रफ़्ता के चराग़ों को जलाये रखिये
यादे-रफ़्ता के चराग़ों को जलाये रखिये
दिले-वीरान की महफ़िल को सजाये रखिये
कौन देता है सदा कान में चुपके-चुपके
मेरी तस्वीर किताबों में सजाये रखिये
जिसके सदक़े से हैं गुलशन की बहारें ज़िन्दा
ख़ुश्बुएं रेशमी ज़ुल्फ़ों में सजाये रखिये
इक झलक देख के गश आने लगा है मुझको
रुखे-अनवार पे चिलमन को गिराये रखिये
एक दिन नाव किनारे से लगेगी "माँझी"
ना-उमीदी है बुरी, आस लगाए रखिये
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. यादे-रफ़्ता=भूली हुई याद, 2. दिले-वीरा=सूना दिल, 3. सद=आवाज़, 4. जिसके सदक़े से=जिसके दान या ख़ैरात के कारण, 5. रुखे-अनवार=चाँद-सा चेहरा, 6. घूँघट, पर्दा।
(समन्दर के दायरे से )
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