134. तुम जहाँ भी हो पास आ जाओ
तुम जहाँ भी हो पास आ जाओ
दिल बहुत है उदास आ जाओ
देखकर आप-जैसी इक सूरत
हो गया बदहवास आ जाओ
रुत सुहानी है सूना-सूना जहाँ
टूट जायेगी आस आ जाओ
मेरी तन्हाई डस रही है मुझे
कैसा संन्यास पास आ जाओ
अब तुम्हारे बग़ैर "माँझी" की
बुझ न पाएगी प्यास आ जाओ
-देवेन्द्र माँझी
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