128. भूल जाएँ किस तरह से तेरे अहसानों को हम
भूल जाएँ किस तरह से तेरे अहसानों को हम
तू ही तू है दो-जहानों में मुहब्बत की क़सम
ऐ मेरे ख़्वाबों की शहजादी तुझे बतलाऊँ क्या
चाँद-तारों से भी आगे हैं तेरे नक़्शे-क़दम
छोड़कर शहरे-तमन्ना जानिबे-सहरा चला
दे गयी पैग़ाम मुझको ढलते-ढलते शामे-ग़म
दिल दुआएँ इस क़दर देता है कुछ मत पूछिए
याद कर लेता हूँ जब तन्हाई में प्यारे सनम
चल कहीं "माँझी" उठा पतवार अपने हाथ में
अब सहा जाता नहीं मौजों का साहिल पे सितम
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. दो-जहानों=ज़मीन और आसमान, आकाश-पाताल, 2. नक़्शे-क़दम =पाँवों के निशान, 3. शहरे-तमन्ना=शहर या नगर की इच्छा, 4. जानिबे-सहरा=रेगिस्तान या मरुस्थल की ओर, 5. शामे-ग़म=दुःख भरी शाम, 6. मौजों का=लहरों का, 7. साहिल पे=तट पर, 8. सितम =अत्याचार।
("समन्दर के दायरे" से)
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