130. क्या मुहब्बत में मात खाई है
क्या मुहब्बत में मात खाई है
आज सबने हँसी उड़ाई है
जा चुका अब कभी न लौटेगा
आस किस शख़्स पर लगाई है
काँप उट्ठा है घर का सन्नाटा
चीख़ फिर खण्डरों से आई है
आईने में तलाश करता हूँ
तूने सूरत कहाँ छुपाई है
जाएँ किस रास्ते पे हम "माँझी"
शमअ़ हर सिम्त ही जलाई है
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. हर सिम्त=चारों तरफ़।
("समन्दर के दायरे" से )
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