110. कहाँ रुकेगा मेरा क़ाफ़िला ख़बर भी नहीं
कहाँ रुकेगा मेरा क़ाफ़िला ख़बर भी नहीं
ये राह वो है जहाँ पर कोई शजर भी नहीं
शबे-फ़िराक़ का मारा हुआ हूँ बरसों से
मेरे नसीब में शायद कोई सहर भी नहीं
हरेक दरख़्त से पतझड़ गुज़र गई ऐ दोस्त
ये कैसी रुत है परिंदों के बालो-पर भी नहीं
वो राज़े-दिल था जो अपना समझ के कह बैठा
सुना है तुझ पर मेरी बात का असर भी नहीं
उड़ी है नाव ये "माँझी" तेरी ख़लाओं में
कमाल ये है यहाँ पर तो बह्रो-बर भी नहीं
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. शजर=पेड़, वृक्ष, 2. शबे-फ़िराक़=विरह की रात, 3. सहर=प्रात:, सवेरा, 4. बालो-पर=पंख और डैने, 5. ख़लाओं=अंतरिक्ष, शून्य, 6. बह्रो-बर=पृथ्वी और समुद्र।
(समन्दर के दायरे से )
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