105. शमअ़-ए-महफ़िल अब यहाँ से दूर जाकर चल कहीं
शमअ़-ए-महफ़िल अब यहाँ से दूर जाकर चल कहीं
मेरी तन्हाई का गुम हो जाए न जंगल कहीं
ज़िन्दगी की शाह-राहों पर भटकता ही रहा
काश!मिल जाए मुझे दीवानगी का हल कहीं
मुस्कुरा जी-भरके लेकिन ध्यान इतना तो रहे
नर्गिसी-आँखों का बह जाए न ये काजल कहीं
बूढ़े बरगद की घनेरी छाँव में बैठा तो हूँ
डर रहा हूँ घेर ले न धूप का आँचल कहीं
साथ "माँझी" के अगर चलना है तो चल धीरे से
टूट जाए न तेरी रस्ते में ये पायल कहीं
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. शमअ़-ए-महफ़िल=सभा का दीपक, 2. शाह-राहो=चौड़ी-चिकनी सड़कें, राजमार्ग।
(यह ग़ज़ल मेरे मेरे प्रथम संग्रह "समन्दर के दायरे" से है, जिसका प्रकाशन आज से तीस साल पहले 1985 में हुआ था )
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