114 . उड़ते हैं ख़यालात ये बेपर कई दिन से
उड़ते हैं ख़यालात ये बेपर कई दिन से
देता है सदा गुम्बदे-बेदर कई दिन से
शीशे के मकानों की तरफ़ देख रहा है
उखड़ा हुआ देहलीज़ का पत्थर कई दिन से
थक-हारके बैठेगा कहीं तो वो मुसाफ़िर
है जिसकी तलब में तेरा लश्कर कई दिन से
ऐ रंगे-चमन दश्ते-तमन्ना से निकल जा
चुभने लगा आँखों में ये मंज़र कई दिन से
इस अंजुमने-नाज़ का दस्तूर है कैसा
देखा ही नहीं फेर के मुँह घर कई दिन से
उस मौजे-फ़ुसूँसाज़ की फ़ुर्क़त में ऐ "माँझी"
डूबा है उदासी में समन्दर कई दिन से
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ-- 1. ख़यालात=सोच, विचार-समूह, 2. बेपर=बिना पंखों के, 3. सदा=आवाज़, 4. गुम्बदे-बेदर=बिना दरवाज़ेवाली बुर्ज, 5. तलब में=चाहत में, 6. लश्कर=फ़ौज, सेना अर्थात आशिक़ का सारा तामझाम, 7. रंगे-चमन=उपवन के मन को मोह लेनेवाले रंग, 8. दश्ते-तमन्ना=इच्छाओं का वीरान जंगल, 9. मंज़र=दृश्य, 10. अंजुमने-नाज़=प्रेयसी की महफ़िल, 11. मौजे-फ़ुसूँसाज़=जादुई लहरें, 12. फ़ुर्क़त=वियोग, जुदाई।
("समन्दर के दायरे" से)
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