131. साहिल था या सुराब डुबोता रहा बहुत
साहिल था या सुराब डुबोता रहा बहुत
इक दुःख-सा पार उतरने का होता रहा बहुत
शायद कोई दिखा गया कल उसको आईना
तन्हा वो शख़्स बैठके रोता रहा बहुत
देखा है करके जीस्त का मैंने मुहासबा
पाने के नाम पे भी मैं खोता रहा बहुत
आई न धूप गर्दे-सऊबत लिए हुए
नंगे शजर की छाँव में सोता रहा बहुत
दामन में मैल फिर भी रहा चढ़ते चाँद का
रुसवाइयों के दाग़ में धोता रहा बहुत
उससे जो कट सके न समन्दर के दायरे
"माँझी" को इसका रंज भी होता रहा बहुत
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1.साहिल=किनारा, तट, 2. सुराब=मृगमरीचिका, 3. जीस्त का=जिन्दगी का, 4. मुहासबा=तुलनात्मक अध्ययन, 5. गर्दे-सऊबत=धूल-भरी आँधी, 6. नंगे शजर की छाँव में=बिना शाख और पत्तोंवाले पेड़ की छाँव में, 7. रुसवाइयों के दाग़=बदनामिओं के दाग़।
( "समन्दर के दायरे" से )
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