119. रात उजली है उजालों से बचा लो मुझको
रात उजली है उजालों से बचा लो मुझको
अपनी इस रेशमी चादर में छुपा लो मुझको
ख़ुद-शिगुफ़्ता हो हसीं-सुर्ख़ गुलाबों की तरह
बू-ए-आवारा हूँ ज़ुल्फ़ों में बसा लो मुझको
पाब-ज़ंजीर कोई चाँदनी उकसाती है
हो सके तीरगी-ए-शब में चुरा लो मुझको
काम आऊँगा दबे-पाँव गुज़रने वालो
मैं गए वक़्त का पत्थर हूँ उठा लो मुझको
दोस्तों! मैं भी इसी शहर का बाशिन्दा हूँ
क्यों गिराते हो निगाहों से सँभालो मुझको
मैं वो तस्वीर हूँ ख़्वाबों की न देखे कोई
अपने तन्हाई के कमरे में सजा लो मुझको
मुझसे गर्दाब में बिछुड़े हैं बहुत-से "माँझी"
मैं वो कश्ती हूँ किनारे से लगा लो मुझको
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. ख़ुद-शिगुफ़्ता=स्वयं खिला हुआ, 2. हसीं-सुर्ख़ गुलाबों की तरह =सुन्दर लाल गुलाबों की तरह, 3. बू-ए-आवारा=भटकती हुई ख़ुशबू , 4. पाब-ज़ंजीर=जिसके पांवों में ज़ंजीर पड़ी हो, श्रृंखलित पांवों वाला, 5. तीरगी-ए-शब में=रात के घोर अँधेरे में, 6. गर्दाब=भँवर।
("समन्दर के दायरे" से)
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. ख़ुद-शिगुफ़्ता=स्वयं खिला हुआ, 2. हसीं-सुर्ख़ गुलाबों की तरह =सुन्दर लाल गुलाबों की तरह, 3. बू-ए-आवारा=भटकती हुई ख़ुशबू , 4. पाब-ज़ंजीर=जिसके पांवों में ज़ंजीर पड़ी हो, श्रृंखलित पांवों वाला, 5. तीरगी-ए-शब में=रात के घोर अँधेरे में, 6. गर्दाब=भँवर।
("समन्दर के दायरे" से)
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