136. कल न मेरा है और न तेरा है
कल न मेरा है और न तेरा है
आख़िरी इस गली में फेरा है
ढूँढता हूँ शजर-शजर तुझको
कौन-सी शाख़ पर बसेरा है
बन्द होने लगे हैं दरवाज़े
शहर को आँधियों ने घेरा है
जिसमें जलते रहे वफ़ा के चिराग़
आज उस बज़्म में अँधेरा है
लूट लेता है बीच दरिया में
कोई "माँझी" यहाँ लुटेरा है
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. शजर-शजर=पेड़-पेड़ पर, 2.वफ़ा के चिराग़=निष्ठा के दीप, 3. बज़्म=महफ़िल।
("समन्दर के दायरे" से)
बन्द होने लगे हैं दरवाज़े
शहर को आँधियों ने घेरा है
जिसमें जलते रहे वफ़ा के चिराग़
आज उस बज़्म में अँधेरा है
लूट लेता है बीच दरिया में
कोई "माँझी" यहाँ लुटेरा है
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. शजर-शजर=पेड़-पेड़ पर, 2.वफ़ा के चिराग़=निष्ठा के दीप, 3. बज़्म=महफ़िल।
("समन्दर के दायरे" से)
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