100. मंज़िल से पलटने का अंदाज़ न दे मुझको
मंज़िल से पलटने का अंदाज़ न दे मुझको
अंजाम पे रहने दे आग़ाज़ न दे मुझको
देखा है बहुत गाकर ये प्यार भरा नग़मा
जिस साज़ पे लय टूटे वो साज़ न दे मुझको
हो जाएगी ऐसे में घर-घर मेरी रुस्वाई
इन ऊँची फ़सीलों से आवाज़ न दे मुझको
उड़कर जो खुली छत पे ज़ुल्फ़ों से लिपट जाऊँ
ऐसी तो कोई क़ुव्वते-परवाज़ न दे मुझको
"माँझी" ने बहुत पी है कह देगा ज़माने से
इस राज़े-मुहब्बत का हमराज़ न दे मुझको
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. अंजाम=परिणाम , 2. आग़ाज़=शुरूआत, 3. फ़सीलों से=परकोटों से, नगर की ऊँची दीवारों से, 4. क़ुव्वते-परवाज़=उड़ने की शक्ति, 5. राज़े-मुहब्बत=प्यार का रहस्य, 6. हमराज़=रहस्य जाननेवाला नज़दीकी दोस्त।
(यह ग़ज़ल मेरे प्रथम संग्रह "समन्दर के दायरे" से है, जिसका प्रथम संस्करण 1985 में प्रकाशित हुआ था )
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