93. तमाम रात तड़पकर निकाल दी मैंने
तमाम रात तड़पकर निकाल दी मैंने
क़ज़ा भी आई जो सर पे वो टाल दी मैंने
ज़माना मेरे तअक़्क़ुब में क्यों है सरगर्दां
कभी से ख़ाक ये दुनिया पे डाल दी मैंने
ख़बर है इश्क़ ने जीना सिखा दिया मुझको
ये ज़िन्दगी तेरे पैकर में ढाल दी मैंने
निकल भी जा तू उजालों में साये की सूरत
निक़ाब वक़्त के चेहरे पे डाल दी मैंने
पसीने आ गए "माँझी" क्यों नाव खेते हुए
वो ख़ूनी लहर थी तट पर उछाल दी मैंने
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. क़ज़ा=मौत, 2. तअक़्क़ुब=पीछा करना, 3. सरगर्दां=घूमना, चक्कर लगाना, 4. पैकर=आकार, सूरत, 5. निक़ाब=पर्दा।
नोट-- यह ग़ज़ल मेरे प्रथम संग्रह "समन्दर के दायरे" से है, 1985 में प्रकाशित हुआ था
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