129. बुझ गई है कहते-कहते शमअ़ परवाने की बात
बुझ गई है कहते-कहते शमअ़ परवाने की बात
उनसे अब मुमकिन नहीं है दिल के बहलाने की बात
मैं जनूने-इश्क़ में पागल नहीं इतना मगर
जाने क्यों वो कर रहे हैं मुझको समझाने की बात
देखते-ही-देखते पतझड़ चला आया यहाँ
और करता ही नहीं वापस चले जाने की बात
जाने क्या-क्या रंग लाएगी मेरी दीवानगी
हर ज़ुबाँ पर घूमती है मेरे अफ़साने की बात
सब के सब "माँझी" वहाँ से अपने घर को चल दिए
जब चली साहिल पे तूफानों से टकराने की बात
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. मुमकिन=संभव, 2. जनूने-इश्क़=प्यार का दीवानापन।
(समन्दर के दायरे से)
No comments:
Post a Comment