92. मेरे क़रीब आ के वो ऐसे गुज़र गए
मेरे क़रीब आ के वो ऐसे गुज़र गए
जैसे मैं बे-ख़बर हूँ मगर बाख़बर गए
जंगल में साँय-साँय की आवाज़ हो गयी
होते ही शाम सारे परिन्दे किधर गए
मौजे-बहार आके जलाती है क्यों मुझे
पतझड़ में अब तो पेड़ से पत्ते बिखर गए
वो लोग ख़ुशबुओं में ही पलकर जवाँ हुए
फूलों की अंजुमन को जो काँटों से भर गए
"माँझी" ये नाव रेत के दरिया में ले चलो
पथरीले पानिओं में समन्दर उतर गए
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. बाख़बर=मालूम होना, 2. मौजे-बहार=सुबह की ठंडी हवाओं की तरंगें।
नोट--यह ग़ज़ल मेरे प्रथम संग्रह "समन्दर के दायरे" से है, जो 1985 में प्रकाशित हुआ था।
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