112. उस वक़्त ही ख़याल-ए-ग़म-ए ज़िन्दगी हुआ
उस वक़्त ही ख़याल-ए-ग़म-ए ज़िन्दगी हुआ
जब आदमी से ख़ौफ़ज़दा आदमी हुआ
शमअ़ के रुख़ पे ख़ून की लाली दिखाई दी
परवाना जब फ़रेफ़्ता-ए-रौशनी हुआ
मत पूछ मुझसे कैफ़ियत-ए- दर्द ऐ नदीम
इक राज़ है न ज़िक्र ज़ुबाँ से कभी हुआ
ये सोचकर मैं ख़ुश हूँ मेरे संगदिल सनम
यूँ भी अदा ये मुझसे हक़-ए-दोस्ती हुआ
है याद मुझको उसकी जवानी का बाँकपन
वो चाँद था कभी, तो कभी चाँदनी हुआ
अच्छा हुआ कि नाव किनारे पे लुट गई
ये हादिसा भी ख़ैर से "माँझी" अभी हुआ
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. ख़याल-ए-ग़म-ए ज़िन्दगी=जीवन के दुःखों का ख़याल या विचार, 2. ख़ौफ़ज़दा=डरा हुआ, 3. फ़रेफ़्ता-ए-रौशनी=उजाले पर मोहित, रौशनी पर आसक्त, 4. कैफ़ियत-ए- दर्द=दुःख की स्थिति, 5. ऐ नदीम=हे मित्र, हे सखा, 6. संगदिल सनम=पत्थर-दिल प्रेमिका, 7. हक़-ए-दोस्ती=मित्रता का हक़, 8. हादिसा=दुर्घटना।
( मेरे प्रथम संग्रह "समन्दर के दायरे" से जिसका प्रथम संस्करण 1985 में प्रकाशित हुआ था --माँझी )
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