103. फिर तिमिर रौशनी ने घेरा आज
फ़िर तिमिर रौशनी ने घेरा आज
आ गया यूँ नया सवेरा आज
इन परिंदों को कुछ नहीं मालूम
होगा किस डाल पे बसेरा आज
हर तरफ़ घूमते हैं काले नाग
ढूँढ़िये ! है कहाँ सपेरा आज
कितना शादाब हो गया जंगल
होते ही बू-ए-गुल का फेरा आज
इस जगह पर तो फूल खिलते थे
कैसे पतझड़ ने डाला डेरा आज
है मुहाफ़िज़ की कोई मजबूरी
बनके आया है जो लुटेरा आज
"माँझी" तूफ़ान है ख़यालों का
जिसमें डूबा है जिस्म मेरा आज
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. शादाब=हरा-भरा, 2. बू-ए-गुल=फूलों की सुगन्ध, ३. मुहाफ़िज़=रक्षक।
(यह ग़ज़ल मेरे प्रथम संग्रह "समन्दर के दायरे" से है, जिसका प्रथम संस्करण-1985 में प्रकाशित हुआ था )
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