97. हाथ उठा कर अगर दुआ माँगूँ
हाथ उठा कर अगर दुआ माँगूँ
देनेवाले मैं तुझसे क्या माँगूँ
इस अँधेरे में कौन देता है
रौशनी का अगर दिया माँगूँ
आ तो जाएँ वो सामने इकबार
उनसे माफ़ी मैं बेख़ता माँगूँ
किस तरह इन घुटी फ़ज़ाओं में
इन दरख़्तों से मैं हवा माँगूँ
जब मैं तुझको पसंद करता हूँ
कौन-सी तुझसे शै जुदा माँगूँ
मर्ज़ बतला के चल दिए "माँझी"
शहर में किससे अब दवा माँगूँ
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. दुआ=भगवान से किसी चीज़ की प्रार्थना, 2. बेख़ता=बेक़ुसूर, निरपराध, 3. फ़ज़ाओं में=वातावरण में, 4. दरख़्तों से=पेड़ों से।
(यह ग़ज़ल मेरे प्रथम संग्रह समन्दर के दायरे से है, जिसका पहला संस्करण 1985 में प्रकाशित हुआ था )
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