Wednesday, July 22, 2015


 जेल का अदभुत अनुभव
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रात नौ बज गये इस देश की मशहूर जेल "तिहाड" से बाहर निकलते-निकलते. ना...ना आप कुछ ग़लत न सोचें, मैं किसी अपराध के चक्कर में जेल नहीं गया था अपितु एक कवि-सम्मेलन में भाग लेने गया था. मित्रो, अन्दर जाकर जो देखा उसने मेरी धारणा को ही बदल दिया. मैं सोचता था कि इतनी बडी जेल में गन्दगी होगी, कै़दियों को कच्चा-पक्का भोजन मिलता होगा, सीलन और सडांध वाला माहौल पसरा होगा चारों तरफ़, लेकिन मेरी ये धारणा उस समय चकनाचूर हो गई जब मैं जेल के अन्दर पहुंचा. जेल प्रशान का व्यवहार भी ऐसा नहीं था जैसा अकसर एक पुलिसवाले का दिखाया जाता है. जेल नम्बर एक में कवि-सम्मेलन था, जिसके आयोजक और संचालक मेरे शिष्य मनीष मधुकर थे. जब मनीष ने मुझे जेल में आयोजित कवि-सम्मेलन के बारे में बताया और वहां चलने का आग्रह किया तो मैंने कटाक्ष करते हुए कहा था "दुनिया में कोई ऐसा शिष्य नहीं होगा जो अपने गुरु को जेल के दर्शन कराने के बारे में सोचता भी होगा, मगर तुम हो कि मुझे जेल पहुंचने के लिये मजबूर कर रहे हो". लेकिन अब सोचता हूं मनीष ने बहुत अच्छा किया मुझे वहां लेजाने की ज़िद पर अडकर. अगर मैं वहां नहीं जाता तो एक अनूठे अनुभव से वंचित रह जाता. कवि-सम्मेलन में मेरे और मनीष के अलावा भाई बागी़ चाचा, डी.एस. भारदवाज. राजेन्द्र कलकल, दीपक सैनी, विनोद पाल सिंह के साथ-साथ प्रियंका राय ने भी अपनी रचनाओं से श्रोताओं को हंसाया और गुदगुदाया ताकि जेल में उनके मन-मस्तिष्क में होनेवाले तनाव को कम किया जा सके.
कवि-सम्मेलन में लगभग दो हज़ार कै़दी श्रोता थे. कवि-सम्मेलन तो अपनी सफ़लता के कारण अनुपम रहा ही, लेकिन मेरा ध्यान वहा की सफ़ाई व्यवस्था ने बरबस ही अपनी और खींच लिया. वहां की सफ़ाई व्यवस्था देखकर में दंग रह गया और पूरे होशो-हवास में शर्त लगाकर यह दावा कर सकता हूं कि दिल्ली की कोई भी पाश कालोनी इतनी साफ़-सुथरी नहीं होगी जितनी अन्दर से तिहाड जेल है. मैनें वहां की किचन भी देखी, वहां बनाया हुआ खाना भी खाया, भाई मज़ा आ गया. अगर मेरा बस चले तो मैं वहीं अपना स्थाई निवास बनाकर बस जाऊं. हां, जेल प्रशासन का व्यवहार भी का़बिले-तारीफ़ मिला. जेल अधीक्षक नवीन कटारिया का तो कहना ही क्या, बहुत ही भले इन्सान हैं वो, उनके व्यवहार ने सबका मन मोह लिया इसके लिये वो अलग से बधाई के पात्र हैं.
                                                                               देवेन्द्र मांझी
                                                                              23 जुलाई 2015

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