123. था जिसका इन्तिज़ार वो लम्हा गुज़र गया
था जिसका इन्तिज़ार वो लम्हा गुज़र गया
इतने बड़े हुजूम में तन्हा गुज़र गया
धूपों पे इस कदर है किसी छाँव का असर
इस रास्ते से क्या कोई साया गुज़र गया
इक लफ़्ज़ भी ज़ुबाँ से निकलना मुहाल था
वो कह रहे हैं हर्फ़े-तमन्ना गुज़र गया
महफ़िल में चल-चलाव किसी बात पर तो है
क्या दरम्यां से चाँद का हाला गुज़र गया
अब क्यों कहेंगे लोग उसे जाने-गुलसिताँ
झोंका इक बहार का आया गुज़र गया
"माँझी" थे जंगलों में ही कश्ती लिये हुए
सुनते हैं शहर-शहर से दरिया गुज़र गया
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. लम्हा=क्षण, 2. मुहाल=मुश्किल, 3. हर्फ़े-तमन्ना=इच्छा या कामना के बोल, 4. दरम्यां से=बीच से, 5. चाँद का हाला=चन्द्राभा, 6. जाने-गुलसिताँ =बाग़ या उद्यान की जान अर्थात बहुत सुन्दर।
("समन्दर के दायरे" से)
No comments:
Post a Comment