132. बेवफ़ा वो लोग हैं जिनसे वफ़ा करता रहा
बेवफ़ा वो लोग हैं जिनसे वफ़ा करता रहा
इसलिए तो साये से अपने सदा डरता रहा
तन्हा बैठा रात की अन्धी गुफा में दोस्तो
ज़िन्दगी के नक़्श में ख़ूने-जिगर भरता रहा
एक अनजानी-सी शै को देखकर ऐसा लगा
राहबर हर राह के हर मोड़ पर मरता रहा
वो दीवाना ही सही दुनिया की नज़रों में मगर
ज़िन्दगी के फ़लसफ़ों को खोलकर धरता रहा
जो कि सीना तानकर आता रहा तन्हाई में
भीड़ की देहलीज़ पर वो किसलिए मरता रहा
घाट पर ही बाँधकर कश्ती को अपनी रात-भर
झील की "माँझी" सतह पर जाने क्या करता रहा
-देवेन्द्र माँझी
("समन्दर के दायरे" से)
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