115 . जब भी आँधी कोई चली होगी
जब भी आँधी कोई चली होगी
शमअ़ महफ़िल में क्या जली होगी
नाम क्यों पूछते हो क़ातिल का
कोई सूरत भली-भली होगी
आइना तुम मुझे दिखाने दो
आज महफ़िल में खलबली होगी
तूने अपनी गली जिसे समझा
वो किसी और की गली होगी
फिर ये "माँझी" कराह उठा कैसे
कोई ठण्डी हवा चली होगी
-देवेन्द्र माँझी
(समन्दर के दायरे से)
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