47. कुछ हक़ीक़त के पास थे सपने
कुछ हक़ीक़त के पास थे सपने
इसलिए सब उदास थे सपने
बेहयाई नहीं थी बिल्कुल भी
यूँ सभी बे-लिबास थे सपने
आँख में मेरी चीख़ उट्ठे थे
आज सब बदहवास थे सपने
उनकी ताबीर चाहे जैसी हो
जितने तेरे थे, ख़ास थे सपने
कोई क़ीमत लगा नहीं पाया
ऐसे "माँझी" के पास थे सपने
-देवेन्द्र माँझी
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