29. मुश्किलें साज़िश लिये थीं, पर मूझे आना पड़ा
मुश्किलें साज़िश लिये थीं, पर मूझे आना पड़ा
भीड़ में दुनीया की ऐसे ख़ुदको गिनवाना पड़ा
आदतन भटकाव का क़ायल रहा हूँ मैं सदा
ज़िन्दगी जीनी थी आख़िर राह पर आना पड़ा
बिजलियाँ-सी कौंधकर उसदम गिरीं दिलपर मेरे
जब खिलौनों के बिना बच्चों को बहलाना पड़ा
जानता था वो ग़लत है फिर भी मैं मजबूर था
टूट ना जाए कहीं घर, ख़ुद को समझाना पड़ा
नाव जब तूफ़ान में "माँझी" फँसी तो सच कहूँ
बेबसी का पोस्टर चेहरे पे चिपकाना पड़ा
-देवेन्द्र माँझी
098793186
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