34. वक़्त की आख़िरी सदा बनकर
वक़्त की आख़िरी सदा बनकर
मैं चला जाऊँगा हवा बनकर
आपकी याद क्यों सताती है
आज अश्कों का सिल्सिला बनकर
जो चला था बदलने दुनिया को
रह गया देखिये वो क्या बनकर
उसके चेहरे की झुर्रियाँ ही बस
बेज़बाँ की रहीं सदा बनकर
आदमी बन गया तो अच्छा हूँ
आप पुजते रहो ख़ुदा बनकर
-देवेन्द्र माँझी
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