87. कैसा मौसम है तेरे नगर का
कैसा मौसम है तेरे नगर का
उड़ गया रंग शाख-ओ-शजर का
आप अच्छे रहे आँख मूँदे
खा गया मुझको धोखा नज़र का
पाँव के साथ इन्साफ़ होगा
जायज़ा ले लिया गर सफ़र का
ग़ैर की छत पे मेरे परिन्दे
ये ही रोना रहा उम्र-भर का
रोज़ आता है लेने उसे क्यों
कौन लगता है "माँझी" भँवर का
-देवेन्द्र माँझी
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