38. ज़िन्दगी को ज़िन्दगी-सा मान मिलता गर यहाँ
ज़िन्दगी को ज़िन्दगी-सा मान मिलता गर यहाँ
बेवजह झुकता नहीं फिर आदमी का सर यहाँ
सुबह-से सारे परिन्दे घोंसलों में बन्द हैं
कौन रखता जा रहा है हर क़दम पर डर यहाँ
आँख तो अपनी बचा लो, कुछ करो, चुप मत रहो
ला रही हैं आँधियाँ अब साथ में कंकर यहाँ
कौन जाने कब निराशा की घटा छंट पाएगी
मारकर मन बैठ जाते हैं सभी अक्सर यहाँ
नाव "माँझी" मूँग दलती मौज की छाती पे जब
बेबसी में डूबते हैं दर्द के सागर यहाँ
-देवेन्द्र माँझी
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