35. मेरे तेरे बीच जब कुछ दूरियाँ सरगर्म थीं
मेरे तेरे बीच जब कुछ दूरियाँ सरगर्म थीं
पास लाने के लिए कुछ खूबियाँ सरगर्म थीं
ख़ौफ़ से सारे परिन्दे उड़ गए आकाश में
जब किसी तकरीर पर कुछ तालियाँ सरगर्म थीं
मर गया वो फ़ैसले की चाह दिल में ही लिए
क्या करें क़ानून की बारीकियाँ सरगर्म थीं
चन्द यारों से मिले कल रात जब हम बज़्म में
होंठ पर प्यालों से ज़्यादा तल्ख़ियाँ सरगर्म थीं
नाव "माँझी" जब समाई लहर के आगोश में
क्या बताऊँ कौन-सी मजबूरियाँ सरगर्म थीं
-देवेन्द्र माँझी
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