88. ये हवा को भी ख़बर है क्या करूँ
ये हवा को भी ख़बर है क्या करूँ
आग का वो हमसफ़र है क्या करूँ
आँख में उसके क़हर है आजकल
बेख़बर सारा नगर है क्या करूँ
लौट जाऊँ ये कभी सीखा नहीं
दूर तक अन्धा सफ़र है क्या करूँ
फूल, पत्ता और साया कुछ नहीं
धूप में जलता शजर है क्या करूँ
मत डरा तू इस तरह "माँझी" मुझे
धुंध छाने को अगर है क्या करूँ
-देवेन्द्र माँझी
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