78. जिसने ख़्वाबों-सा कभी आँख में पाला मुझको
जिसने ख़्वाबों-सा कभी आँख में पाला मुझको
आज तिनके की तरह उसने निकाला मुझको
दोस्तों की तो कभी सफ़ में नहीं देखा था
कौन था जिसने सरे-शाम सम्हाला मुझको
अपने भक्तों से भी उकता-सा गया लगता है
रोज़ आवाज़-सी देता है शिवाला मुझको
आ गया गर तू ज़मीं पर तो नहीं लौटेगा
अपनी ज़न्नत का न दे और हवाला मुझको
देखता यूँ ही रहा खोटो-खरापन मेरा
मौज-दर-मौज समन्दर ने उछाला मुझको
मैं नदी ऐसी कि पानी ही नहीं है मुझमें
फिर भी "मांझी" ने कई रोज़ खंगाला मुझको
-देवेन्द्र माँझी
No comments:
Post a Comment