30. सभी के सामने मैं बोल दूँ ये भी हक़ीक़त क्या
सभी के सामने मैं बोल दूँ ये भी हक़ीक़त क्या
तुम्हारी बेरुख़ी क्या है, तुम्हारी है मुहब्बत क्या
न होंठों पर कोई जुम्बिश, न आँखों में कोई हलचल
कोई बतलाये तो लिक्खी है उस रुख़ पर इबारत क्या
यहाँ के देवता क्यों भूल जाते हैं हक़ीक़त ये
कि जिसका पेट खाली है करेगा वो इबादत क्या
मुझे समझाने वाले अब बता ये बात तू मुझको
मैं जब ख़ुद से निभा लूँगा तो है तेरी ज़रूरत क्या
वो "माँझी" है निकल जाएगा कस-ओ-बल तो उसका भी
भँवर के सामने आकर बचेगा वो सलामत क्या
- देवेन्द्र माँझी
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