63. होंठों की प्यास का यहाँ चर्चा भी मैं रहूँ
होंठों की प्यास का यहाँ चर्चा भी मैं रहूँ
पानी भी भरके लाऊँ मैं, प्यासा भी मैं रहूँ
दुनिया की सारी लानतें मुझपर ही वार कर
वो चाहते हैं हर तरह अच्छा भी मैं रहूँ
कटने की बारी आये तो मेरा ही सर कटे
जब धूप साज़िशें रचे, साया भी मैं रहूँ
अपनी सभी अलामतें फैंके जो मेरे द्वार
उपदेश दे रहे हैं वो अपना भी मैं रहूँ
मुमकिन नहीं है "माँझी" ये ऐसा जो हो सके
सहरा भी मैं रहूँ यहाँ दरिया भी मैं रहूँ
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ-1. लानतें=फटकार, धिक्कार, 2. वार कर=न्योछावर करके, 3. अलामतें=चिह्न, निशान, पहचान, 4. सहरा=रेगिस्तान, मरुस्थल।
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