44. किस तरह सीखें भला इस दौर के हम आचरण
किस तरह सीखें भला इस दौर के हम आचरण
देखने में है सरल लेकिन कठिन है व्याकरण
नग्नता को देखकर शरमा रही अश्लीलता
क्या यही है आपका अपना खुला वातावरण
वक़्त ही कुछ ओर था जब वो टँगा सूली पे था
अब नहीं करता है कोई ईसा सूली का वरण
संसदी रावण के अब दरबार में है खलबली
भूख-बदहाली बनी है आज अंगद का चरण
नाव को तूफ़ान से खींचो भी "माँझी" ध्यान से
बस इसी पर तो टिका है आपका जीवन-मरण
-देवेन्द्र माँझी
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