81. हमसफ़र ये तो बता तुझको कभी
हमसफ़र ये तो बता तुझको कभी
रास्तों ने दी सदा तुझको कभी
धूप का सारा बदन खोया कहाँ
कुछ पता इसका चला तुझको कभी
ये सियासी-पेड़ दे ना पाएगा
फूल, फल, ताज़ी हवा तुझको कभी
टाल दी थीं बात तूने ही सभी
क्या नहीं मैंने कहा तुझको कभी
दूर दरिया से है "माँझी" किसलिए
क्या लगा इसका पता तुझको कभी
-देवेन्द्र माँझी
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