70. मेरा दिल ज़ुल्मे-शाही से बग़ावत ही नहीं करता
मेरा दिल ज़ुल्मे-शाही से बग़ावत ही नहीं करता
अगर मैं आग को छूने की ज़ुर्रत ही नहीं करता
जो मुस्काते हैं भक्तों की करुण आवाज़ सुनकर भी
मैं ऐसे देवताओं की इबादत ही नहीं करता
मेरी क़िस्मत के सब पन्ने अभी-तक अनलिखे ही हैं
वो क़ातिब क्यों बना जब वो क़िताबत ही नहीं करता
डराते मौत के क़िस्सों से उसको हम भला कैसे
वो ऐसा शख़्स है ख़ुदसे मुहब्बत ही नहीं करता
बला की चीज़ है "माँझी" बचा लेता है कश्ती को
कभी दरिया-ओ-लहरों की शिकायत ही नहीं करता
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ--1. ज़ुर्रत=साहस, 2. क़ातिब=लिखनेवाला, लेखक , 3. क़िताबत=लिखने का कार्य।
No comments:
Post a Comment