55. जब कभी सच्चाई और ईमान बन जाते हैं लोग
जब कभी सच्चाई और ईमान बन जाते हैं लोग
क़ौम करती नाज़ उन पर, शान बन जाते हैं लोग
वक़्त के क़दमों में बेड़ी डालकर, रुख़ मोड़कर
अपने-अपने दौर की पहचान बन जाते हैं लोग
मेरे हमसाये ने पूछा नाम मेरा आज फिर
जानकर भी किस तरह अनजान बन जाते हैं लोग
एक जीवन कम है यारो ये समझने के लिए
क्यों कभी मुर्दा, कभी श्मशान बन जाते हैं लोग
ख़्वाब देकर कर दिए क़ुदरत ने सब मसले खड़े
छोड़कर इन्सानियत हैवान बन जाते हैं लोग
-देवेन्द्र माँझी
No comments:
Post a Comment