45. बीत गया जो कल ही था वो, आएगा जो वो भी कल है
बीत गया जो कल ही था वो, आएगा जो वो भी कल है
दुनिया को भटकाने वाला "कल" का ही तो जंगल है
इतनी आफ़त कब आती है बोलो तो बेबात यहाँ
मैं किस पर इल्ज़ाम लगाऊँ मेरा मन ही चंचल है
खोल नहीं पाया हूँ इनको लौट रहा हूँ बे-मन सा
दुनिया के हर रिश्ते के दरवाज़े पर इक साँकल है
मामा-चाचा-ताऊ की पहचान चुकी सी जाती है
सब रिश्तों को लील रहा इक अंग्रेज़ी का अंकल है
दरिया है ना कश्ती है इन रेत-भरे सहराओं में
फिर चप्पू से खेल रहा है देखो "माँझी" पागल है
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ-1. सहराओं में=मरुस्थलों में .
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