89. चुपचाप अंजुमन से कहाँ जा रहे हैं लोग
चुपचाप अंजुमन से कहाँ जा रहे हैं लोग
लगता है जैसे आन के पछता रहे हैं लोग
वो कौन-सा गुनाह किया है कि सब-के-सब
इक-दूसरे को देखकर शरमा रहे हैं लोग
ढलने लगी है रात झरोके को खोल दे
ऐ जाने-इन्तिज़ार सज़ा पा रहे हैं लोग
क्या बात है शबाब पर होते हुए बहार
बाग़ों के दरम्यान भी मुरझा रहे हैं लोग
ये किसके फूल फैंक दिए हैं नदी के बीच
"माँझी" इधर-उधर से चले आ रहे हैं लोग
-देवेन्द्र माँझी
मेरे प्रथम संग्रह "समन्दर के दायरे से, जो 1985 में प्रकाशित हुआ था
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