66. हमने मानी बात ये, उससे जुदा कुछ भी नहीं
हमने मानी बात ये, उससे जुदा कुछ भी नहीं
हम न पूजें गर उसे फिर देवता कुछ भी नहीं
आओगे तो पाओगे उजड़ा मकाँ, बिखरी किताब
मेरी दौलत है यही, इसके सिवा कुछ भी नहीं
मैं लगा दीवार से गुमसुम बना बैठा हूँ यूँ
गर न देखे कोई चेहरा आईना कुछ भी नहीं
छू गयी बिजली की जैसे तार नंगी सी मुझे
याद है उसने छुआ जब, फिर पता कुछ भी नहीं
इसलिए कतराके इस दरिया से "माँझी" चल दिया
कौन उसको पूछता जिसकी हवा कुछ भी नहीं
-देवेन्द्र माँझी
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