57. इसका निर्णय भी तू ख़ुद ही कर ज़िन्दगी
इसका निर्णय भी तू ख़ुद ही कर ज़िन्दगी
कौन-सा तुझमें भर दूँ कलर ज़िन्दगी
है जुझारू तू ख़ुद में अगर ज़िन्दगी
चाहती मुझसे क्यों है मफ़र ज़िन्दगी
जितना जो भी बढ़े, उतना वो ही घटे
राम जाने है कैसा सफ़र ज़िन्दगी
जी रहे हैं तुझे फिर भी भयभीत हैं
तुझसे लगता है क्यों सबको डर ज़िन्दगी
डूब जाता है "माँझी" इसी में यूँही
ख़ूबसूरत-सा है इक भँवर ज़िन्दगी
-देवेन्द्र माँझी
शब्दार्थ-1. मफ़र=दूर भागना, पलायन करना।
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