आज के दिन आया जीवन में बदलाव
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हाँ दोस्तों, आज 25 जून है. चालीस साल पहले आज के दिन इस देश में इमरजेंसी लगी थी. पूरे देश को कारागार में तब्दील कर दिया गया था। उस समय मेरी आयु 18 वर्ष थी. किशोरावस्था को छोड़कर मैं जवानी की देहलीज़ पर क़दम रख रहा था लेकिन इमरजेंसी के काले साये को तरुणाई की मेरी मस्ती रास नहीं आई। युवा था, तो उस समय देश में चल रही राजनीतिक और सामाजिक गतिविधिओं की तरफ़ भी मेरा रुझान बढ़ रहा था। बस यही बात स्थानीय प्रशासन को खल गयी। नतीजतन, एक थानेदार दो सिपाहिओं को लेकर मेरे यहाँ आ धमका. उस समय मैं अपने पिताजी (श्री गोपी चन्द गोयल ) के साथ उनकी अनाज की आढ़त पर बैठा हुआ था। आते ही थानेदार ने झूठ बोला "देवेन्द्र, तुम्हारे कुछ साथिओं में झगड़ा हो गया है, वे थाने में बैठे हैं, तुम चलकर उनका फैसला करा दो. मुझे थानेदार की बात पर विश्वास नहीं आया। मेरा दिल कुछ और ही गवाही दे रहा था। फिर भी, थानेदार की बात मानकर थाने तो जाना ही था। मैं उनके साथ थाने पहुँचा तो सच्चाई सामने आई. मगर उससे बचने का कोई रास्ता नहीं था। दर-अस्ल उन दिनों लोकनायक जय प्रकाश नारायण का आन्दोलन ज़ोरों पर था। मैं भी उससे हमदर्दी रखता था। उसी से नाराज प्रशासन ने मुझे गिरफ़्तार करने का फैसला ले लिया। मुझे डीआईआर (डिफेन्स इंडियन रूल्स )-33 के अंतर्गत गिरिफ़्तार करके मुझपर आरोप लगाया गया की मैं सशस्त्र जुलूस निकाल रहा था तथा थाने और तहसील को फूंकने जा रहा था , यह दूसरी बात है कि तथाकथित सशस्त्र जुलूस निकालने वाले को तो पुलिस ने गिरिफ़्तार कर लिया मगर उसके शस्त्र पुलिस के हाथ कभी नहीं लग पाये। ख़ैर, मुझे नूँह (मेवात ज़िला मुख्यालय, हरियाणा) से गिरिफ़्तार करके, क़ानूनी नाटकों से गुजारकर गुड़गांव के ज़िला कारागार में भेज दिया। यहाँ मुझे बैरेक नंबर 4 में रखा गया। मेरे साथ पलवल से मूलचंद मंगला और फरीदाबाद के दीपचंद भाटिया भी उसी बैरेक में बंद थे, जो बाद में 1977 के चुनावों में क्रमश पलवल और फरीदाबाद से विधायक चुने गए। ख़ैर, उनकी कहानी उनके साथ, मैं जेल के अंदर यही सोचता रहता था कि किस तरह झूठे आरोप लगाकर पुलिस किसी को गिरिफ़्तार कर लेती है। ज्यों-ज्यों मैं सोचता, मेरा खून और अधिक उबाल मारने लगता। हाँ, एक बात ज़रूर अच्छी हुई। वो यह कि मुझे साहित्य और विशेषरूप से ग़ज़ल के बारे में यहाँ के एकान्त जीवन में सोचने-विचारने और समझने का भरपूर अवसर मिला। यहीं से मेरी ग़ज़लों ने उड़ान भरनी शुरू की. यहीं से एक व्यापारी का बेटा एक ग़ज़लकार के रूप में अपनी सोचों को विस्तार देने में जुट गया था। आज न नूँह का वह थाना है और न गुड़गांव का वह जिला कारागार, दोनों को तोड़कर नई जगह बना दिया गया है, मगर मेरे मन की टीस ज्यों की त्यों बाक़ी है।
-देवेन्द्र माँझी, 25 जून, 2015
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