75. किया हाल सूरज ने क्या रात का
किया हाल सूरज ने क्या रात का
निशाँ तक न बाक़ी बचा रात का
नगर की ख़मोशी भी छंट जाएगी
पढ़ा है अभी मर्सिया रात का
बुढ़ापा क्यों सूरज को आने लगा
जला है जो फिर से दीया रात का
चलो बज़्म रंगीन हम भी करें
सुनाई दिया कहकहा रात का
कहाँ होश "माँझी" को उस वक़्त था
भुला दो सुना और कहा रात का
-देवेन्द्र माँझी
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