31. बहरे टापू की तरह, गूँगे जज़ीरे की तरह
बहरे टापू की तरह, गूँगे जज़ीरे की तरह
प्यार है मेरे लिए अन्धे के सपने की तरह
लोग मुझसे गुफ़्तगू को किसलिए पागल हुए
रह रहा हूँ आजकल मैं बन्द कमरे की तरह
इक खिलौना प्यार का टूटा है, आ जाएगा और
रूठकर बैठा है क्यों तू ज़िद्दी बच्चे की तरह
क्या है मजबूरी जो नाचे हैं सभी रक़्कास बन
ज़िन्दगी भी सज रही है एक कोठे की तराह
पर कटेंगे ख़्वाब के जिस-दिन तेरे "माँझी" यहाँ
फड़फड़ाता ही रहेगा तू परिन्दे की तरह
-देवेन्द्र माँझी
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