51. मैं अँधेरा हूँ अँधेरे में निकाले कोई
मैं अँधेरा हूँ अँधेरे में निकाले कोई
क़ैद मुठ्ठी में करे घर के उजाले कोई
मैंने मंज़िल के लिए कितनी मुसाफ़त की है
आके देखे तो सही पाँव के छाले कोई
मैं तो माहताब की उम्मीद लिए बैठा हूँ
इन फ़सीलों से चिराग़ों को हटा ले कोई
ऐसी दुनिया से तो जी ऊब गया है अपना
इक नया शहर, नई बस्ती बसा ले कोई
सिलसिला तोड़के ख़्वाबों का शबे-आख़िर में
अपनी सोई हुई तक़दीर जगा ले कोई
डूब जाने का है अंदेशा भँवर में "माँझी"
नाव काग़ज़ की है पतवार सँभाले कोई
-देवेन्द्र माँझी
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